Wednesday, April 29, 2020


घाटे का मुद्रीकरण - पैसे छापे या नहीं

भारतीय अर्थव्यवस्था की विकास की दर में पिछ्ली 7 तिमाही से मंदी देखी जा रही है। अब कोविड 19 की वजह से आज हमारी अर्थव्यवस्था पूरी तरह से रुक गई है। चालू वित्त वर्ष 2020 - 21 में सकल घरेलू उत्पाद (जी डी पी) 0 से 1 प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया जा रहा है।


मंदी के कारण - किसी भी जी डी पी के चार स्तंभ होते है, सरकारी अंतिम उपभोग व्यय, निजी अंतिम उपभोग व्यय, सकल स्थाई पूंजी निर्माण (निवेश) एवं निर्यात। इन चार स्तंभ में से निर्यात एवं नया निवेश पिछ्ली कई तिमाहियों से रुके हुए है। अब लॉकडाउन की वज़ह से निजी अंतिम उपभोग व्यय भी रुक गया है जिसका भारतीय जी डी पी मे 58 से 62 प्रतिशत तक का हिस्सा है। लॉकडाउन की वज़ह से आम लोगों की आमदनी पर असर पड़ रहा है जिससे वस्तु और सेवा की मांग में कमी देखी जाएगी।

अब सवाल यह है कि मांग को कैसे बढ़ाया जाये? पहला तरीका है कि रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था में नगदी बढ़ाये जो कि रिजर्व बैंक मौद्रिक नीति द्वारा प्रयास कर रहा है लेकिन बैंक मौजूदा परिस्थितियों में लोन देने से झिझक रही है। दूसरा तरीका है कि सरकार अपने ख़र्चे बढ़ाये और राहत पैकेज के द्वारा अर्थव्यवस्था में नगदी बढ़ाये।

सरकार के पास वर्तमान में सीमित उपाय है। लॉकडाउन की वज़ह से कर के माध्यम से होने वाली सरकार की आय घट जाएगी। सरकार के पास एक विकल्प है, कि बाजार से कर्ज ले। मौजूदा समय में विदेशी निवेशक विकासशील अर्थव्यवस्था में पैसे लगाने के बजाये अधिक सुरक्षित विकल्प में अपना पैसा लगा रहे है, जिससे बाज़ार में पैसे की कमी है और जो पैसा है उस पर ब्याज दर अधिक है।

सरकार के पास मौजूदा स्थिति में एक विकल्प रहता है - घाटे का मुद्रीकरण (Deficit Monetization)

घाटे के मुद्रीकरण में सरकार रिजर्व बैंक से रुपया छापने को कहती है, और बदले में रिजर्व बैंक को बॉन्ड जारी किया जाता है। अब सरकार के पास पैसे हैं जरूरतमंद लोगों के खाते में जमा करने के लिए, स्वास्थ सेवा पर खर्च करने के लिए, बाजार में मांग बढ़ाने के लिए और छोटे और मध्यम श्रेणी के उद्योगों में काम करने वाले कर्मचारियों को वैज सब्सिडी देने के लिए।

यह साधन इसी माह इंग्लैंड में अपनाया गया जहा बैंक ऑफ इंग्लैंड ने मुद्रा छाप कर सरकार को दी और इंग्लैंड की सरकार ने बैंक ऑफ इंग्लैंड को बॉन्ड जारी करे। यह साधन भारत में भी 1997 तक अपनाया जाता था। 1994 में तब के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने घाटे के मुद्रीकरण को बंद करने का फैसला लिया और 1997 में तब के रिजर्व बैंक के गवर्नर सी रंगराजन ने इसे बंद कर दिया।

इस साधन के नुकसान भी है - अगर सरकार ने सही समय पर इसका उपयोग बंद नहीं किया तो नए रुपये छापने की वज़ह से बाज़ार में नगदी अधिक मात्रा में हो जाएगी, जिससे महँगाई बढ़ सकती है। अर्थव्यवस्था में महँगाई एक सीमा तक अच्छा संकेत रहती है पर उससे अधिक होने पर एक नई समस्या को जन्म दे सकती है।

सरकार को मौजूदा परिस्थिति में घाटे का मुद्रीकरण करना चाहिए जिससे लोगों की मदद की जा सके और यह ध्यान में रखकर कि इस का अधिक उपयोग ना हो।